रायपुर। आज जब पूरा देश आजादी के 80 वर्ष के जश्न में डूबा है, राजनांदगांव की गलियों में एक अलग ही सुर गूंज उठता है, बेंजो के तारों से निकलती वह धुन, जिसमें छत्तीसगढ़ की माटी की सोंधी खुशबू घुली है। मंच पर जब गोविंद साव अपनी उंगलियां बेंजो पर दौड़ाते हैं, तो सामने बैठे श्रोता मंत्रमुग्ध होकर झूम उठते हैं। बरसों की तपस्या से तराशी गई यह कला, मानो हर धुन के साथ छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति की कहानी सुना रही हो।

खुमान साव संगीत अकादमी (राष्ट्रपति पुरस्कृत ) के संस्थापक लोक कलाकार गोविंद साव पिछले कई वर्षों से इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में जुटे हैं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कड़ी साधना और अनुशासन में समर्पित किया, ताकि छत्तीसगढ़ की लोक संगीत परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंच सके।

बेंजो वादन में साव जी की महारत उन्हें अन्य कलाकारों से अलग पहचान देती है। यह वाद्ययंत्र जितना बजाने में कठिन माना जाता है, उतनी ही सहजता से साव जी इसे साधते हैं, और यही उनकी वर्षों की साधना का प्रमाण है।

खुमान साव संगीत अकादमी के माध्यम से गोविंद साव न केवल स्वयं प्रस्तुति देते हैं, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों को भी प्रशिक्षित कर इस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। यह अकादमी छत्तीसगढ़ की लोक कला को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरी है।

आजादी के 80वें वर्ष के इस अवसर पर गोविंद साव जैसे लोक कलाकारों का योगदान याद दिलाता है कि देश की असली पहचान केवल बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि इन मिट्टी से जुड़े साधकों की अनथक साधना में भी बसती है, जिन्होंने अपनी कला के जरिए छत्तीसगढ़ का मान पूरे देश में ऊंचा किया है।

Share

अन्य समाचार

img-20260818-wa0047

हे मानव मुझे मत मार...

हे मानव तू अपना भूख शांत कर पर मुझे जान से मत मार ! मुझे भी दर्द होता है मुझमें भी जान बसती है ...


Read More...
img-20260812-180325

सावन का महीना...कोई प्रियजन दूर हो तो उसकी याद और गहरी हो जाती है, और जो पास हों उनके साथ का हर पल और अनमोल लगने लगता है

गांव की गलियों में बच्चे भीगते हुए दौड़ लगाते हैं, कागज की नावें बनाकर नालियों में तैराते हैं। पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते हैं और युवतियां "सावन के झूले" गाते हुए झूला झूलती हैं।


Read More...
5a41aa1a-baf2-4369-b0a7-70a60eab0a55

छत्तीसगढ़ी लोकजीवन के रंग समेटे हैं चंपेश्वर गोस्वामी के गीत

जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन के हर पड़ाव पर गीत साथ चलते हैं लोरी से लेकर विवाह के मंगलगीत तक। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में इसी लोकजीवन की विविधता और गहराई देखने को मिलती है।


Read More...
img-20260726-wa0022

ग्रामीण संस्कृति पर संदर्भित चार पुस्तकों का विमोचन

इन पुस्तकों में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी उपन्यास "बड़े दाऊजी"लेखक डॉ.डी.पी.देशमुख,"सोनहा माटी"डॉ.दीनदयाल साहू कृत एवं डॉ.गिरधर चंद्रा द्वारा लिखित दो हिंदी काव्य संग्रह "अंतर्मन का शब्द"व " भावों की अभिव्यक्ति" शामिल है।


Read More...
img-20260608-wa0000

विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में साहित्य और संस्कृति के साधकों का सम्मान

वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी डॉ. दीनदयाल साहू तथा डॉ. डी.पी. देशमुख को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।


Read More...
9d4cc6a0-bb3b-4b4e-86bd-d97cd7687c18

वो सुकून भरी रोशनियाँ अब कहाँ हैं…

क्योंकि सच तो यही है इस चमकती दुनिया में सब कुछ रोशन होकर भी बहुत कुछ अंधेरे में खो गया है…।


Read More...
img-20260511-wa0034

जब संवेदनाएं बनीं उपन्यास...‘पीरा’ के जरिए जनभावनाओं को आवाज़ देने वाला साहित्यिक सफर...साहित्य साधना से समाज को दिशा दे रहे हैं डॉ. दीनदयाल साहू

रायपुर के न्यू सर्किट हाउस सभागार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित एक दिवसीय साहित्यिक समारोह में डॉ. दीनदयाल साहू की बहुचर्चित छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘पीरा’ का भव्य विमोचन हुआ


Read More...
99a347d7-1a59-4733-b671-3885b41d248c

जब किसी बच्चे ने पहली बार “मां” कहा…

रजनी राठी का मानना है कि हर बच्चे के भीतर एक अनोखी प्रतिभा छिपी होती है, बस उसे सही दिशा और संवेदनशील सहयोग की जरूरत होती है। वे आधुनिक तकनीकों और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से बच्चों के संचार कौशल को विकसित करने में लगातार कार्य कर रही हैं। उनका यह समर्पण केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति सेवा का जीवंत उदाहरण बन चुका है।


Read More...
img-20260504-072916

संस्मरण....मिट्टी का घर, खपरैल की छत तले बसी ठंडी दुनिया

आज जब कंक्रीट के जंगलों में हम एसी और कूलर के बीच भी चैन नहीं ढूंढ पाते, तब मिट्टी-खपरैल के वे घर याद आते हैं। वे घर, जो सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का सबसे खूबसूरत उदाहरण थे। शायद यही वजह है कि उन घरों की यादें आज भी दिल के किसी कोने में ठंडी छांव बनकर जिंदा हैं जहां लौटने का मन बार-बार करता है।


Read More...