मैं हूँ…रात की तरह गहरी,पर भीतर उजाले की एक लौ लिए जो हर अंधेरे को चुनौती देती है।

रास्ते आसान नहीं थे,हर मोड़ पर ठोकरें मिलीं,कभी सपनों ने साथ छोड़ा,तो कभी अपनों ने समझा नहीं।

पर मैंने सीखा है दर्द को छुपाना नहीं,उसे अपनी ताकत बनाना है,आंसुओं को बहाना नहीं,उन्हें अपने इरादों में ढालना है।

संघर्ष मेरे साथी हैं,जो मुझे गिराते नहीं,हर बार कुछ नया सिखाते हैं,हर हार में एक नई जीत का बीज बो जाते हैं।

मैं रुकी नहीं…क्योंकि रुकना मेरी फितरत नहीं,मैं झुकी नहीं…क्योंकि झुकना मेरी आदत नहीं।

मैंने अपने जख्मों से हीहिम्मत का दीप जलाया है,हर दर्द को सीढ़ी बनाकरखुद को और ऊँचा उठाया है।

आज भी सफर जारी है,मंज़िलें अभी बाकी हैं,पर यकीन है मुझे मेरे कदम कभी थमेंगे नहीं।

क्योंकि मैंने सीख लिया है संघर्षों को गले लगाकर,दर्द को ताकत बनाकर,हर हाल में आगे बढ़ने की कला।

यह कहानी अभी खत्म नहीं,यह तो बस शुरुआत है—एक नई उड़ान की, एक नए आसमान की।

रजनी जोशी

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