कमलेश यादव : दोपहर की तेज धूप आसमान से जैसे आग बरसा रही है। सड़कें तप रही हैं, हवा भी अंगारों जैसी चुभ रही है। लेकिन जैसे ही कदम उस मिट्टी-खपरैल के घर की देहरी पर पड़ते हैं, एक अलग ही दुनिया सामने खुल जाती है। भीतर घुसते ही ठंडक का ऐसा अहसास होता है मानो किसी ने तपते शरीर पर शीतल जल की फुहार डाल दी हो। दीवारों से आती मिट्टी की सौंधी खुशबू मन को सुकून देती है, और खपरैल की छत के नीचे पसरी शांति जैसे सारी थकान को अपने साथ बहा ले जाती है।

उस घर का आंगन, जहां सुबह-सुबह पानी का छिड़काव किया जाता था, अब भी ठंडक समेटे हुए है। कोने में रखा मटका, जिसके पास जाते ही ठंडे पानी की मीठी तासीर गले से उतरकर आत्मा तक पहुंच जाती है। कहीं दादी की खटिया बिछी है, तो कहीं बच्चों की खिलखिलाहट की गूंज।

खपरैल की छत से छनकर आती हल्की रोशनी जैसे हर कोने को एक कहानी में बदल देती है एक ऐसी कहानी, जो आज भी दिल में बसी है। गर्मी के उन दिनों में, जब बाहर लू के थपेड़े चेहरे को झुलसा देते थे, यही घर सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन जाता था। मोटी मिट्टी की दीवारें बाहर की तपिश को अंदर आने ही नहीं देती थीं।

हवा खिड़कियों से होकर जब अंदर प्रवेश करती, तो वह ठंडी होकर गालों को छूती जैसे कोई अपना स्नेह से सहला रहा हो। यहां पंखों या एसी की जरूरत नहीं थी, क्योंकि प्रकृति खुद इस घर की रखवाली करती थी। शाम होते ही जब सूरज ढलता, तो खपरैल की छत पर बैठकर आसमान के रंग बदलते देखना एक अलग ही आनंद देता था।

पक्षियों का लौटना, दूर कहीं से आती गायों की घंटियों की आवाज, और चूल्हे से उठती रोटी की महक सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते थे, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। यह सिर्फ एक घर नहीं था, यह जीवन का वह हिस्सा था, जहां हर पल में अपनापन और सुकून बसा हुआ था। आज जब कंक्रीट के जंगलों में हम एसी और कूलर के बीच भी चैन नहीं ढूंढ पाते, तब मिट्टी-खपरैल के वे घर याद आते हैं।

वे घर, जो सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का सबसे खूबसूरत उदाहरण थे। शायद यही वजह है कि उन घरों की यादें आज भी दिल के किसी कोने में ठंडी छांव बनकर जिंदा हैं जहां लौटने का मन बार-बार करता है।

Share

अन्य समाचार

img-20260608-wa0000

विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में साहित्य और संस्कृति के साधकों का सम्मान

वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी डॉ. दीनदयाल साहू तथा डॉ. डी.पी. देशमुख को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।


Read More...
9d4cc6a0-bb3b-4b4e-86bd-d97cd7687c18

वो सुकून भरी रोशनियाँ अब कहाँ हैं…

क्योंकि सच तो यही है इस चमकती दुनिया में सब कुछ रोशन होकर भी बहुत कुछ अंधेरे में खो गया है…।


Read More...
img-20260511-wa0034

जब संवेदनाएं बनीं उपन्यास...‘पीरा’ के जरिए जनभावनाओं को आवाज़ देने वाला साहित्यिक सफर...साहित्य साधना से समाज को दिशा दे रहे हैं डॉ. दीनदयाल साहू

रायपुर के न्यू सर्किट हाउस सभागार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित एक दिवसीय साहित्यिक समारोह में डॉ. दीनदयाल साहू की बहुचर्चित छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘पीरा’ का भव्य विमोचन हुआ


Read More...
99a347d7-1a59-4733-b671-3885b41d248c

जब किसी बच्चे ने पहली बार “मां” कहा…

रजनी राठी का मानना है कि हर बच्चे के भीतर एक अनोखी प्रतिभा छिपी होती है, बस उसे सही दिशा और संवेदनशील सहयोग की जरूरत होती है। वे आधुनिक तकनीकों और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से बच्चों के संचार कौशल को विकसित करने में लगातार कार्य कर रही हैं। उनका यह समर्पण केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति सेवा का जीवंत उदाहरण बन चुका है।


Read More...
workers-5708691-1280

मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या

रामधारी सिंह दिनकर साहित्य के वह सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी कलम में दिनकर यानी सूर्य के समान चमक थी। उनकी कविताएं सिर्फ़ उनके समय का सूरज नहीं हैं बल्कि उसकी रौशनी से पीढ़ियां प्रकाशमान होती हैं।


Read More...
img-20260429-070635

समसामयिक विषय...सूखते दरख़्त, बुझती नदियाँ: इंसान कब समझेगा अपनी भूल...जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन की भयावह तस्वीर

आज पूरा देश प्रचंड गर्मी की चपेट में है, लेकिन यह संकट अचानक नहीं आया। एक ओर हम “पेड़ लगाओ” का नारा लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है।


Read More...
hot-burning-sun-australian-outback-summer-great-background-image-showing-strength-might-heat-78588887

हमने जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल बो दिए,और फिर AC में बैठकर बोले “बहुत गर्मी है

अप्रैल ही तो है…पर लगता है जैसे सूरज ने जून से उधार ले ली हो आग,धरती तप रही है यूँ… जैसे किसी ने रख दी हो उस पर नाराज़गी की राख।


Read More...
img-5963

जब खैरागढ़ से उठी कला की गूंज, और थाईलैंड तक पहुँची भारत की पहचान

मो. आसिफ हुसैन, राजेंद्र कुमार, तोषिता असाटी, मधुश्मिता पॉल और एक्कलक नू नगियोन ने जैसे ही अपनी प्रस्तुतियाँ शुरू कीं, हर नजर उन पर टिक गई। उनके हर भाव, हर सुर और हर कदम में भारतीय संस्कृति की गहराई झलक रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे भारत की आत्मा स्वयं उस मंच पर जीवंत हो उठी हो।


Read More...
img-20260226-wa0000

डॉ. शुभा मिश्रा और गजेंद्र कुमार साहू सरस्वती साहित्य नव लेखक सम्मान से सम्मानित

विमतारा सभागार रायपुर में सरस्वती बुक्स व श्रीसाईनाथ फाउंडेशन के द्वारा आयोजित सरस्वती साहित्य सम्मान समारोह में डॉ. शुभा मिश्रा और गजेंद्र कुमार साहू को सरस्वती साहित्य नव लेखक सम्मान से सम्मानित किया गया


Read More...