डॉ. लूनेश कुमार वर्मा : गीत कविता की सबसे पुरानी और लोकप्रिय विधा है, जिसमें स्वर और लय आपस में गुंथे होते हैं। जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन के हर पड़ाव पर गीत साथ चलते हैं लोरी से लेकर विवाह के मंगलगीत तक। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में इसी लोकजीवन की विविधता और गहराई देखने को मिलती है।

गोस्वामी की रचनाओं में सबसे पहले मातृत्व और वात्सल्य का सुंदर चित्रण मिलता है। शिशु की लोरी से लेकर घर-आँगन के आनंद तक, उनके गीत परिवार की खुशियों को शब्दों में पिरोते हैं। इसके साथ ही प्रकृति भी उनके गीतों की आत्मा है नदी, झरने, पहाड़, पेड़-पौधे और पशु-पक्षियों को वे अपने जीवन के संगी-साथी मानते हैं और मनुष्य से प्रकृति के संरक्षण का आह्वान करते हैं।

गोस्वामी के गीतों में सामाजिक यथार्थ भी मुखर होकर सामने आता है। छत्तीसगढ़ की समृद्ध खनिज संपदा के बावजूद आम जनता की गरीबी और शोषण पर वे तीखी टिप्पणी करते हैं। इसी तरह ट्रक चालकों जैसे घुमंतू जीवन बिताने वाले वर्ग की व्यथा और परदेश गए बच्चों की प्रतीक्षा में बूढ़े हो चले माता-पिता की वेदना भी उनके गीतों में मार्मिक रूप से उभरती है।

बदलते सामाजिक परिवेश पर भी उनकी पैनी नजर है। पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण और अपनी जड़ों से कटते जा रहे समाज पर वे व्यंग्यात्मक शैली में चोट करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के प्रति गहरा अनुराग भी उनके गीतों में झलकता है।

उनकी एक पंक्ति है— "मया पीरीत मनमीत हे सुग्घर, हिरदे मं संगीत हे सुग्घर, भाव प्रभाव के भाखा हमर, छत्तीसगढ़ी मीठ हे सुग्घर।" समय के चक्र और जीवन के उतार-चढ़ाव को भी वे सहजता से गीतों में उतारते हैं, जो निराश मन को धैर्य और आशा का संबल देते हैं।

निष्कर्षत: चंपेश्वर गोस्वामी के गीत मात्र मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं। उनके गीतों में गेयता के साथ-साथ गहरी सामाजिक दृष्टि भी विद्यमान है, जो उन्हें छत्तीसगढ़ी साहित्य में विशिष्ट स्थान दिलाती है।

लेखक संपर्क: डॉ. लूनेश कुमार वर्मा (व्याख्याता) शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय छछानपैरी, विकासखंड-अभनपुर, जिला-रायपुर (छत्तीसगढ़) मो. 8109249517 ई-मेल: luneshverma@gmail.com

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