गोपी साहू : राजनांदगांव जिले के छोटे-से गांव रामपुर में इन दिनों हाथों की गति कुछ अलग ही लय में चल रही है। गणेश उत्सव नजदीक है, और शिल्पकार मनोज कुमार सोनी की कार्यशाला में मानो मिट्टी खुद बप्पा का रूप लेने को बेताब है। जो हाथ बरसों से पत्थर में भगवान, देवी और लोकजीवन के प्रसंगों को उकेरते रहे हैं, वे अब गणपति की मिट्टी की मूर्ति को आकार देने में जुटे हैं ।हर स्पर्श के साथ एक नई मुस्कान, एक नया भाव उभरता जा रहा है।

जब त्योहार कार्यशाला में उतर आता है: आम दिनों में मनोज की कार्यशाला पत्थर तराशने की शांत साधना का केंद्र होती है, लेकिन गणेशोत्सव नजदीक आते ही यहां हलचल बढ़ जाती है। गांव के बच्चे कार्यशाला के बाहर जमा होकर देखते हैं कि आज मिट्टी में गणेश जी का कौन-सा रूप उभर रहा है कभी मोदक थामे बालरूप, तो कभी आशीर्वाद देती भव्य प्रतिमा। मनोज बताते हैं कि गणपति को गढ़ना उनके लिए हर बार एक नई चुनौती और एक नया उत्सव होता है, क्योंकि हर प्रतिमा में उन्हें गांव की श्रद्धा और उम्मीदों को भी शामिल करना होता है।

पत्थर के शिल्पकार का मिट्टी से रिश्ता: मनोज की पहचान भले ही पत्थर की मूर्तियों से बनी हो, पर गणेश उत्सव के समय वे परंपरा का सम्मान करते हुए मिट्टी का ही गणपति गढ़ते हैं पर्यावरण के अनुकूल और परंपरा के अनुरूप। वे कहते हैं कि माध्यम चाहे पत्थर हो या मिट्टी, कला की आत्मा वही रहती है; बस मिट्टी में भाव उतारना ज्यादा कोमल और तरल अनुभव होता है, मानो प्रतिमा हर पल सांस ले रही हो।

रामपुर का बदलता उत्सव: एक समय था जब रामपुर में गणेशोत्सव एक साधारण पारिवारिक आयोजन तक सीमित था। अब मनोज की कलाकृतियों की वजह से आसपास के गांवों से भी लोग यहां पहुंचने लगे हैं, यह देखने कि इस बार बप्पा किस रूप में गढ़े गए हैं। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि मनोज ने त्योहार को सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे कला और सामूहिकता का उत्सव बना दिया है।

हर मूर्ति में एक भाव, एक कहानी: मनोज के लिए हर गणेश प्रतिमा सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा है। वे कहते हैं कि जब वे मिट्टी को हाथों में लेकर आकार देना शुरू करते हैं, तो असल में वे यह पहले से तय नहीं करते कि गणेश जी कैसे दिखेंगे बल्कि मिट्टी खुद ही धीरे-धीरे अपना रूप प्रकट करती जाती है, और उनका काम बस उस रूप को उभरने देना होता है। यही सोच उनकी हर कृति को अनोखा बनाती है, जिसमें छत्तीसगढ़ी मिट्टी की सोंधी आस्था और शिल्प की बारीकी दोनों झलकती है।

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