- Post by Admin on Tuesday, May 12, 2026
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कारवी यादव : भीड़ में बहुत से लोग दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपनी कलम से समाज की आत्मा को आवाज़ देते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार एवं संपादक डॉ. दीनदयाल साहू उन्हीं नामों में शामिल हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनभावनाओं, संघर्षों और मिट्टी की पीड़ा से जोड़ दिया। उनकी लेखनी में गांव की खुशबू है, आम जनमानस का दर्द है और समाज को जागृत करने की अद्भुत शक्ति भी हैं।
गौरतलब है कि, रायपुर के न्यू सर्किट हाउस सभागार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित एक दिवसीय साहित्यिक समारोह में डॉ. दीनदयाल साहू की बहुचर्चित छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘पीरा’ का भव्य विमोचन हुआ। इस गरिमामयी अवसर पर दक्षिण रायपुर विधायक सुनील सोनी, पद्मश्री एवं धरसींवा विधायक अनुज शर्मा, इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, राजभाषा आयोग अध्यक्ष प्रभात मिश्रा सहित प्रदेश के अनेक साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।
डॉ. दीनदयाल साहू की साहित्य यात्रा निरंतर नई ऊँचाइयों को छू रही है। ‘पीरा’ उनकी तीसरी उपन्यास है, जबकि ‘अंतस के पीरा’ और ‘सोनहा माटी’ जैसी छत्तीसगढ़ी कृतियाँ प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, लोकजीवन, संघर्ष, संवेदनाएं और सामाजिक सरोकार जीवंत रूप में दिखाई देते हैं। यही कारण है कि पाठकों के बीच उनकी पुस्तकों को विशेष सम्मान मिलता है।
सिर्फ उपन्यास ही नहीं, डॉ. साहू ने छत्तीसगढ़ी और हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। अब तक उनकी 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो उनके साहित्यिक समर्पण और अथक साधना का प्रमाण हैं। वे उन चुनिंदा साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने क्षेत्रीय भाषा को सम्मान दिलाने के साथ नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया है।
उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे अंचल के लिए प्रेरणा है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना यह साबित करता है कि सच्ची लगन, निरंतर अध्ययन और समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण इंसान को विशिष्ट बना देते हैं। डॉ. दीनदयाल साहू की लेखनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सीख देती है।
डॉ. साहू की इस उपलब्धि पर क्षेत्र की साहित्यिक संस्थाओं, लोक कला मंचों और सामाजिक संगठनों ने उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। साहित्य प्रेमियों का मानना है कि उनकी रचनाएं केवल किताबें नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं का दस्तावेज हैं। आज जब क्षेत्रीय भाषाएं चुनौतियों का सामना कर रही हैं, ऐसे समय में डॉ. दीनदयाल साहू जैसे साहित्यकार अपनी सृजनशीलता से छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को नई ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
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