कारवी यादव : भीड़ में बहुत से लोग दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपनी कलम से समाज की आत्मा को आवाज़ देते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार एवं संपादक डॉ. दीनदयाल साहू उन्हीं नामों में शामिल हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनभावनाओं, संघर्षों और मिट्टी की पीड़ा से जोड़ दिया। उनकी लेखनी में गांव की खुशबू है, आम जनमानस का दर्द है और समाज को जागृत करने की अद्भुत शक्ति भी हैं।

गौरतलब है कि, रायपुर के न्यू सर्किट हाउस सभागार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित एक दिवसीय साहित्यिक समारोह में डॉ. दीनदयाल साहू की बहुचर्चित छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘पीरा’ का भव्य विमोचन हुआ। इस गरिमामयी अवसर पर दक्षिण रायपुर विधायक सुनील सोनी, पद्मश्री एवं धरसींवा विधायक अनुज शर्मा, इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, राजभाषा आयोग अध्यक्ष प्रभात मिश्रा सहित प्रदेश के अनेक साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

डॉ. दीनदयाल साहू की साहित्य यात्रा निरंतर नई ऊँचाइयों को छू रही है। ‘पीरा’ उनकी तीसरी उपन्यास है, जबकि ‘अंतस के पीरा’ और ‘सोनहा माटी’ जैसी छत्तीसगढ़ी कृतियाँ प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, लोकजीवन, संघर्ष, संवेदनाएं और सामाजिक सरोकार जीवंत रूप में दिखाई देते हैं। यही कारण है कि पाठकों के बीच उनकी पुस्तकों को विशेष सम्मान मिलता है।

सिर्फ उपन्यास ही नहीं, डॉ. साहू ने छत्तीसगढ़ी और हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। अब तक उनकी 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो उनके साहित्यिक समर्पण और अथक साधना का प्रमाण हैं। वे उन चुनिंदा साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने क्षेत्रीय भाषा को सम्मान दिलाने के साथ नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया है।

उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे अंचल के लिए प्रेरणा है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना यह साबित करता है कि सच्ची लगन, निरंतर अध्ययन और समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण इंसान को विशिष्ट बना देते हैं। डॉ. दीनदयाल साहू की लेखनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सीख देती है।

डॉ. साहू की इस उपलब्धि पर क्षेत्र की साहित्यिक संस्थाओं, लोक कला मंचों और सामाजिक संगठनों ने उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। साहित्य प्रेमियों का मानना है कि उनकी रचनाएं केवल किताबें नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं का दस्तावेज हैं। आज जब क्षेत्रीय भाषाएं चुनौतियों का सामना कर रही हैं, ऐसे समय में डॉ. दीनदयाल साहू जैसे साहित्यकार अपनी सृजनशीलता से छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को नई ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।

Share

अन्य समाचार

img-20260818-wa0047

हे मानव मुझे मत मार...

हे मानव तू अपना भूख शांत कर पर मुझे जान से मत मार ! मुझे भी दर्द होता है मुझमें भी जान बसती है ...


Read More...
img-20260812-180325

सावन का महीना...कोई प्रियजन दूर हो तो उसकी याद और गहरी हो जाती है, और जो पास हों उनके साथ का हर पल और अनमोल लगने लगता है

गांव की गलियों में बच्चे भीगते हुए दौड़ लगाते हैं, कागज की नावें बनाकर नालियों में तैराते हैं। पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ जाते हैं और युवतियां "सावन के झूले" गाते हुए झूला झूलती हैं।


Read More...
img-20260812-wa0024

बेंजो के तारों से छत्तीसगढ़ी माटी की महक बिखेरने वाले साधक गोविंद साव

खुमान साव संगीत अकादमी (राष्ट्रपति पुरस्कृत ) के संस्थापक लोक कलाकार गोविंद साव पिछले कई वर्षों से इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में जुटे हैं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कड़ी साधना और अनुशासन में समर्पित किया, ताकि छत्तीसगढ़ की लोक संगीत परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंच सके।


Read More...
5a41aa1a-baf2-4369-b0a7-70a60eab0a55

छत्तीसगढ़ी लोकजीवन के रंग समेटे हैं चंपेश्वर गोस्वामी के गीत

जन्म से मृत्यु तक मानव जीवन के हर पड़ाव पर गीत साथ चलते हैं लोरी से लेकर विवाह के मंगलगीत तक। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार चंपेश्वर गोस्वामी के गीतों में इसी लोकजीवन की विविधता और गहराई देखने को मिलती है।


Read More...
img-20260726-wa0022

ग्रामीण संस्कृति पर संदर्भित चार पुस्तकों का विमोचन

इन पुस्तकों में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर केंद्रित छत्तीसगढ़ी उपन्यास "बड़े दाऊजी"लेखक डॉ.डी.पी.देशमुख,"सोनहा माटी"डॉ.दीनदयाल साहू कृत एवं डॉ.गिरधर चंद्रा द्वारा लिखित दो हिंदी काव्य संग्रह "अंतर्मन का शब्द"व " भावों की अभिव्यक्ति" शामिल है।


Read More...
img-20260608-wa0000

विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में साहित्य और संस्कृति के साधकों का सम्मान

वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी डॉ. दीनदयाल साहू तथा डॉ. डी.पी. देशमुख को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया।


Read More...
9d4cc6a0-bb3b-4b4e-86bd-d97cd7687c18

वो सुकून भरी रोशनियाँ अब कहाँ हैं…

क्योंकि सच तो यही है इस चमकती दुनिया में सब कुछ रोशन होकर भी बहुत कुछ अंधेरे में खो गया है…।


Read More...
99a347d7-1a59-4733-b671-3885b41d248c

जब किसी बच्चे ने पहली बार “मां” कहा…

रजनी राठी का मानना है कि हर बच्चे के भीतर एक अनोखी प्रतिभा छिपी होती है, बस उसे सही दिशा और संवेदनशील सहयोग की जरूरत होती है। वे आधुनिक तकनीकों और विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से बच्चों के संचार कौशल को विकसित करने में लगातार कार्य कर रही हैं। उनका यह समर्पण केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति सेवा का जीवंत उदाहरण बन चुका है।


Read More...
img-20260504-072916

संस्मरण....मिट्टी का घर, खपरैल की छत तले बसी ठंडी दुनिया

आज जब कंक्रीट के जंगलों में हम एसी और कूलर के बीच भी चैन नहीं ढूंढ पाते, तब मिट्टी-खपरैल के वे घर याद आते हैं। वे घर, जो सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल का सबसे खूबसूरत उदाहरण थे। शायद यही वजह है कि उन घरों की यादें आज भी दिल के किसी कोने में ठंडी छांव बनकर जिंदा हैं जहां लौटने का मन बार-बार करता है।


Read More...