कमलेश यादव : राष्ट्रपति भवन का भव्य दरबार सोमवार को उस समय गर्व की भावना से भर उठा, जब देश के बहादुर वीरों को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। इस सम्मान समारोह में जब छत्तीसगढ़ पुलिस के निरीक्षक लक्ष्मण केवट और निरीक्षक रामेश्वर प्रसाद देशमुख का नाम पुकारा गया, तब केवल दो अफसर सम्मानित नहीं हो रहे थे, बल्कि उनके साथ उन सैकड़ों जवानों का साहस, समर्पण और संघर्ष भी सम्मान पा रहा था, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाया।

आज हर कोई जानना चाहता है कि आखिर इन दो अधिकारियों ने ऐसा क्या किया, जिसने उन्हें देश के सर्वोच्च वीरता सम्मानों में शामिल कर दिया। इसकी कहानी हमें राष्ट्रपति भवन की चमक-दमक से दूर, बस्तर और कांकेर के घने जंगलों तक ले जाती है, जहां हर कदम पर खतरा था और हर सांस के साथ मौत मंडरा रही थी।

16 अप्रैल 2024 की सुबह सुरक्षा बलों की एक बड़ी टीम कांकेर जिले के छोटे बेठिया क्षेत्र के हापाटोला जंगल में अभियान पर निकली थी। सब कुछ सामान्य दिख रहा था, लेकिन अचानक नक्सलियों ने घात लगाकर हमला बोल दिया। गोलियों की आवाज से पूरा जंगल गूंज उठा। यह वह क्षण था, जहां एक छोटी सी चूक सैकड़ों परिवारों को जीवनभर का दर्द दे सकती थी।

ऐसे कठिन समय में निरीक्षक लक्ष्मण केवट और निरीक्षक रामेश्वर देशमुख ने अद्भुत धैर्य और नेतृत्व का परिचय दिया। उन्होंने घबराने के बजाय तत्काल रणनीति बदली और जवानों को संगठित करते हुए मोर्चा संभाल लिया। तीन घंटे से अधिक समय तक चली भीषण मुठभेड़ में दोनों अधिकारी लगातार अग्रिम पंक्ति में डटे रहे। उनकी सूझबूझ और साहस का परिणाम यह रहा कि लगभग 200 जवान सुरक्षित बच निकले। इस अभियान में चार जवान घायल हुए, लेकिन उन्हें भी सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

वहीं दूसरी ओर नक्सलियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। मुठभेड़ समाप्त होने के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सुरक्षा बलों ने 15 महिला नक्सलियों सहित कुल 29 नक्सलियों को मार गिराया था। इसे छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे सफल एंटी-नक्सल अभियानों में से एक माना गया।

दरअसल, यह पहली बार नहीं था जब इन दोनों अधिकारियों ने असाधारण साहस दिखाया हो। पुलिस महकमे में लक्ष्मण केवट और रामेश्वर देशमुख की पहचान नक्सल ऑपरेशन विशेषज्ञों के रूप में है।

बताया जाता है कि लक्ष्मण केवट अब तक 97 नक्सलियों के विरुद्ध हुई सफल कार्रवाइयों का हिस्सा रह चुके हैं, जबकि रामेश्वर देशमुख ने 56 से अधिक अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्षों का अनुभव और जोखिम भरे अभियानों में अर्जित आत्मविश्वास इस सफलता की मजबूत नींव बना।

इनकी वीरता का सम्मान पहले भी कई बार हो चुका है। लक्ष्मण केवट को राष्ट्रपति पुलिस पदक सहित अनेक वीरता सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वहीं रामेश्वर देशमुख को भी उनकी उत्कृष्ट सेवाओं और बहादुरी के लिए कई बार सम्मानित किया गया है। लेकिन शौर्य चक्र का सम्मान उनके करियर में एक ऐसी उपलब्धि है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगी।

राष्ट्रपति भवन में मिला यह शौर्य चक्र केवल दो अफसरों की बहादुरी का सम्मान नहीं है। यह उन अनगिनत जवानों के त्याग, साहस और समर्पण को नमन है, जो हर दिन देश की सुरक्षा के लिए अपने परिवारों से दूर रहकर चुनौतियों का सामना करते हैं। छत्तीसगढ़ के इन दो जांबाज बेटों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब हौसले बुलंद हों, तो सबसे कठिन जंगलों में भी जीत का रास्ता बनाया जा सकता है।

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