- Post by Admin on Monday, May 11, 2026
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रजनी जोशी : खैरागढ़ की शांत फिजाओं में उस दिन कला केवल दीवारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह सांस ले रही थी, सवाल पूछ रही थी और लोगों को भीतर तक झकझोर रही थी। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के राजमहल परिसर के सामने जब लोगों की नजर बांस से बनी एक झोपड़ी पर पड़ी, जो काली पन्नियों और प्लास्टिक में जकड़ी हुई थी, तो हर कोई कुछ पल के लिए ठहर गया। यह सिर्फ एक कला प्रदर्शनी नहीं थी, बल्कि ग्रामीण संस्कृति की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद का जीवंत चित्रण था।
मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स प्रथम वर्ष के छात्र अनमोल गोयल द्वारा तैयार की गई इस इंस्टॉलेशन कला ने आधुनिकता के अंधाधुंध प्रभाव और पर्यावरण प्रदूषण के बीच दम तोड़ती लोककलाओं की ओर समाज का ध्यान खींचा। बांस से बनी झोपड़ी मानो यह कह रही थी कि कभी प्रकृति के करीब रहने वाली हमारी संस्कृति अब प्लास्टिक के जाल में कैद होती जा रही है। दर्शक इस दृश्य को केवल देख नहीं रहे थे, बल्कि महसूस कर रहे थे।
प्रदर्शनी की सबसे खास बात यह रही कि इसमें समस्या के साथ समाधान की राह भी दिखाई गई। अनमोल गोयल ने स्थानीय बांस कलाकारों की पारंपरिक कला को आधुनिकता से जोड़ते हुए यह संदेश दिया कि यदि ग्रामीण हस्तशिल्प को समय के अनुसार नया रूप दिया जाए, तो कलाकारों का भविष्य बदल सकता है। बांस से बनी आधुनिक घड़ियां, आकर्षक लैंप, फर्नीचर, खिलौने और मिनिएचर कलाकृतियां यह साबित कर रही थीं कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं।
इस कला प्रदर्शनी में केवल इंस्टॉलेशन ही नहीं, बल्कि चित्रकला ने भी लोगों को गहराई से प्रभावित किया। मिक्स मीडिया, चारकोल और अन्य माध्यमों से तैयार चित्रों में बांस कलाकारों के पारिवारिक जीवन, संघर्ष, गरीबी और उम्मीदों को बेहद संवेदनशील तरीके से उकेरा गया था। हर चित्र मानो कलाकारों की अनकही कहानी कह रहा था। दर्शकों को ऐसा महसूस हुआ जैसे वे उन परिवारों के जीवन को करीब से देख और महसूस कर रहे हों।
कार्यक्रम में उपस्थित विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा ने छात्र के इस नवाचार की सराहना करते हुए कहा कि जब कला समाज की समस्याओं को आवाज देती है और साथ ही समाधान की दिशा भी दिखाती है, तभी वह वास्तव में सार्थक बनती है। उन्होंने कहा कि ऐसी रचनात्मक सोच ग्रामीण कलाकारों के आर्थिक उत्थान और सांस्कृतिक संरक्षण दोनों के लिए बेहद जरूरी है।
इस जटिल इंस्टॉलेशन को साकार करने में अनमोल गोयल के छात्रावास के मित्रों ने भी रात-दिन मेहनत की। उनकी सामूहिक मेहनत और कला के प्रति समर्पण ने इस प्रदर्शनी को एक जीवंत अनुभव बना दिया। यह आयोजन केवल एक छात्र की प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक मौन संदेश था कि यदि आज भी हम अपनी लोककलाओं और प्रकृति से जुड़ी संस्कृति को नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल तस्वीरों और यादों में ही देख पाएंगी।
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