कोंडागांव; बस्तर में औषधीय खेती को लेकर आयोजित प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला केवल एक कृषि कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासी समाज, वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय नेतृत्व के ऐतिहासिक संगम के रूप में उभरा। क्षेत्रीय सह सुविधा केन्द्र (मध्य क्षेत्र), जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर तथा राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में यह आयोजन माँ दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर, चिखलपुटी (कोंडागांव) में संपन्न हुआ।

कोंडागांव, माकड़ी और मर्दापाल विकासखंड के लगभग 16 गांवों - लेमड़ी, सितली, केरावाही, बांग्ला, भोगाड़ी, गोलावंड, उमरगांव, भीरावंड, खड़का, कांटागांव, बड़े बेंदरी, पोलेंग, पल्ली आदि - से बड़ी संख्या में आदिवासी किसान बहन-भाई शामिल हुए। बईठका हाल खचाखच भरा रहा, जो बस्तर में जैविक और औषधीय खेती के प्रति बढ़ते भरोसे का प्रमाण है।

किसानों ने काली मिर्च, ऑस्ट्रेलियन टीक, हल्दी, एनाटो, सफेद मूसली और स्टीविया जैसी फसलों का अवलोकन किया तथा अश्वगंधा और कपिकच्छु के बीज निःशुल्क प्राप्त किए। बड़ी संख्या में किसानों ने जैविक पद्धति से जड़ी-बूटी खेती अपनाने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्रीय सह सुविधा केन्द्र जबलपुर के डायरेक्टर एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. ज्ञानेंद्र तिवारी उपस्थित रहे। अध्यक्षता वरिष्ठ समाजसेवी भूपेश तिवारी ने की। कार्यक्रम का दूसरा सत्र और भी ऐतिहासिक बन गया जब छत्तीसगढ़ आदिवासी समाज के कार्यकारी अध्यक्ष राजाराम तोड़ेम मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे तथा अध्यक्षता आदिवासी समाज, बस्तर संभाग के अध्यक्ष दशरथ कश्यप ने की।

दोनों आदिवासी नेताओं ने मंच से स्पष्ट कहा, “आदिवासी जंगल के बिना नहीं जी सकता। यह दुर्भाग्य है कि विभिन्न कारणों से जंगल कम होते जा रहे हैं। अब हमें पेड़ों और जंगलों को कटने से बचाना होगा और माँ दंतेश्वरी हर्बल समूह से जुड़कर पेड़ लगाना तथा जड़ी-बूटियों की खेती सीखनी होगी।” दशरथ कश्यप ने कहा कि वे कई दशकों से डॉ. राजाराम त्रिपाठी के कार्यों से परिचित और प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर का नाम देश-विदेश में ऊंचा करने का कार्य हुआ है, जिस पर पूरा आदिवासी समाज गौरवान्वित है। दोनों नेताओं ने एक स्वर में कहा कि बस्तर के विकास के लिए आदिवासी परिवारों को साथ लेकर आगे बढ़ें, समाज आपके साथ खड़ा है।

कार्यक्रम की एक और विशेष उपलब्धि रही माकड़ी विकासखंड के कांटागांव की प्रगतिशील आदिवासी महिला किसान राजकुमारी मरकाम का सम्मान। निःशुल्क प्रदत्त पौधों से 54 किलो काली मिर्च उत्पादन कर उन्होंने यह सिद्ध किया कि वैज्ञानिक मार्गदर्शन और बाजार सहयोग मिलने पर आदिवासी किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि औषधीय पौधों का बाजार लगातार बढ़ रहा है और आयुष क्षेत्र का कारोबार तेजी से विस्तार पा रहा है। ऐसे में बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र इस परिवर्तन के केंद्र बन सकते हैं।

बस्तर की मिट्टी, आदिवासी परिश्रम, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और अब आदिवासी समाज के शीर्ष नेतृत्व का खुला समर्थन, यह संकेत दे रहा है कि यहाँ शुरू हुई हर्बल पहल आने वाले समय में व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकती है।

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