- Post by Admin on Tuesday, Oct 13, 2026
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रजनी जोशी, रायपुर: उनके पास शिकायत करने की कई वजहें थीं, पर विद्या राजपूत ने दूसरों के लिए रास्ता बनाना चुना। कोंडागांव में जन्मी विद्या को उनके अपने घर ने नहीं अपनाया, फिर भी उनकी ज़िद सिर्फ़ इतनी है कि जो दर्द उन्होंने सहा, वह कोई और न सहे। विद्या कहती हैं कि ट्रांस समुदाय के अपने साथियों की ज़िम्मेदारी उन्होंने उठा ली है और आख़िरी साँस तक उनके लिए काम करेंगी।
बस्तर से रायपुर तक का सफर: विद्या का जन्म कोंडागांव (छत्तीसगढ़) में हुआ। छह भाई-बहनों में सबसे छोटी विद्या का बचपन आसान नहीं था। स्कूल में साथी पूछते थे "तू लड़का है या लड़की?।" घर में भी अगर वो घर का काम करतीं तो ताना मिलता - "मर्द बनो"। अपने आप को अंदर से महिला महसूस करने वाली विद्या इस द्वंद्व में घुटती रहीं।
90 के दशक में न इंटरनेट था, न कोई जानकारी। फिल्मों में किन्नरों को सिर्फ गाते-नाचते दिखाया जाता था। आखिरकार 21 साल की उम्र में वो अपना गाँव छोड़कर रायपुर आ गईं। एक छोटे से होटल में फ्रंट ऑफिस का काम करते हुए पहली बार उनकी मुलाकात अपने जैसे ट्रांसजेंडर समुदाय से हुई।
विद्या कहती हैं - "मुझे पता था, एक बार सच्चाई बताई तो पुरानी जिंदगी खत्म। कई लोगों ने बात करना बंद कर दिया, पर मैं इसके लिए तैयार थी।"
"मितवा" की शुरुआत: "मितवा" का मतलब है साथी या दोस्त। इसी नाम से विद्या ने अपने समुदाय को एक सूत्र में बाँधने का काम शुरू किया। उन्होंने 2009 में मितवा समिति की सह-स्थापना की, ताकि ट्रांस समुदाय को संगठित किया जा सके और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई और जागरूकता फैलाई जा सके। आज विद्या छत्तीसगढ़ मितवा संकल्प समिति की अध्यक्ष के रूप में जानी जाती हैं।
आज मितवा समिति रायपुर के सरोना में "गरिमा गृह" चलाती है। यहाँ समाज से बहिष्कृत 18 से 60 साल के ट्रांसजेंडरों को आश्रय मिलता है। सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटीशियन, सेल्फ डिफेंस, कुकिंग, स्किल डेवलपमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है। विद्या के अनुसार यहाँ से ट्रेनिंग लेने वाले 50% लोगों को बड़ी कंपनियों और सरकारी नौकरियों में जॉब मिल जाती है।
शुरुआत नियमित बैठकों से हुई। फिर समाज के लिए खेल प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। विद्या और उनके साथी सरकारी व्यवस्था को संवेदनशील बनाने के लिए अधिकारियों और मंत्रियोंसे मिलते रहे।
सिर्फ़ आवाज़ नहीं, रोज़गार और सम्मान भी: विद्या का मानना रहा कि सम्मान की शुरुआत आत्मनिर्भरता से होती है। समिति ने ट्रांसजेंडर लोगों को नगर निकाय और निजी क्षेत्र में नौकरी दिलाने में मदद की। जो अपना छोटा काम शुरू करना चाहते थे, उनके लिए लोन की व्यवस्था भी करवाई।
संकट के दौर में भी समिति साथ खड़ी रही। एक अभियान के तहत विद्या ने ट्रांस समुदाय के करीब 350 लोगों के लिए राशन जुटाने की मुहिम चलाई।
जब 15 जोड़ों ने बाँधा रिश्ते का बंधन: विद्या की पहल का एक यादगार पल रायपुर का सामूहिक विवाह समारोह रहा। इस आयोजन में 15 ट्रांसजेंडर जोड़ों की शादी हुई। इसे समुदाय के लिए देश में अपनी तरह का पहला आयोजन बताया गया, जिसकी परिकल्पना विद्या राजपूत और उनकी टीम ने की थी। विद्या का कहना था कि दूसरों की तरह ट्रांसजेंडर को भी प्यार, साथ और वैवाहिक जीवन जीने का हक है।
गणतंत्र दिवस परेड में समुदाय की मौजूदगी: विद्या इसे अपनी बड़ी जीत मानती हैं। 2023 की गणतंत्र दिवस परेड में छत्तीसगढ़ में पहली बार नौ ट्रांसजेंडर लोगों ने हिस्सा लिया। उनके लिए यह सिर्फ़ एक परेड नहीं थी। यह समाज में समुदाय की पहचान और स्वीकार्यता की ओर एक कदम था।
दक्षिण एशिया स्तर पर सम्मान: उनके काम को देश के बाहर भी पहचान मिली। उन्हें पहला कमला भसीन (दक्षिण एशिया) पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार नेपाल की नतीसारा राय के साथ साझा किया गया और इसमें एक लाख रुपये की राशि शामिल थी। यह सम्मान नई दिल्ली में एक समारोह में दिया गया।
विद्या राजपूत आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। छत्तीसगढ़ मितवा संकल्प समिति की अध्यक्ष और हाल ही में 9th Plan India Impact Award 2026 में Best Community Volunteer का राष्ट्रीय सम्मान जीतने वाली विद्या की कहानी संघर्ष से शिखर तक की है।
पुरस्कार पाकर विद्या ने कहा कि यह सम्मान उन्हें और उनके जैसे सभी लोगों को हिम्मत देगा। उनके मुताबिक आज तक ट्रांसजेंडर समुदाय के हिस्से में परिवार और समाज से सिर्फ़ ठुकराया जाना ही आया है।
एक प्रेरणा, जो बाकी है: विद्या राजपूत की कहानी बताती है कि समाज के ठुकराने से किसी की पहचान नहीं मिटती। जब कोई अपने दर्द को दूसरों की ताकत बना ले, तो वह पूरे समाज की सोच बदल सकता है। बस्तर की एक बेटी ने रायपुर में सैकड़ों लोगों को पहचान, रोज़गार और सम्मान की राह दिखाई है।
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