रजनी जोशी : समाजसेविका रुना शर्मा को समझने के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं, बस इतना काफी है कि उन्होंने वो देखा जो अक्सर लोग देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। जिस रायपुर में मॉल की चमक और सड़कों की रफ्तार तरक्की की कहानी सुनाती थी, उसी रायपुर के किसी कोने में एक बच्ची अपनी दिव्यांगता के साथ अकेली जूझ रही थी, कोई माँ अपने बीमार बच्चे को गोद में लेकर सरकारी अस्पताल की लाइन में खड़ी थी, और कोई महिला सिलाई मशीन चलाना जानते हुए भी उसे छूने की इजाज़त नहीं पाती थी।

रुना शर्मा ने इन तस्वीरों को सिर्फ देखा नहीं, महसूस किया और यही एहसास उनके लिए काफी था कुछ बड़ा करने के लिए। न कोई भारी बजट था, न कोई बड़ा संगठनात्मक ढाँचा, बस एक सच्ची नीयत थी। और उसी नीयत ने 6 जून 2018 को छत्तीसगढ़ की धरती पर एक ऐसी कहानी की नींव रखी, जो आगे चलकर हजारों चेहरों पर मुस्कान बनकर उभरी इस कहानी का नाम है आर्ना फाउंडेशन।

शुरुआत हुई स्वास्थ्य शिविरों से। गली-मोहल्लों में जब मेडिकल कैंप लगते, तो बुजुर्ग चेहरों पर उम्मीद की एक झलक दिखती कोई है जो बिना किसी स्वार्थ के उनकी सुध ले रहा है। आगे चलकर आँखों की रोशनी लौटाने वाले आई कैंप और नेत्र ऑपरेशन भी इस सफर का हिस्सा बने, मानो अंधेरे में उजाले की कुछ बूँदें टपक रही हों।

महिलाओं के लिए यह संस्था सिर्फ मददगार नहीं, बल्कि एक साथी बनकर सामने आई। गाइनेकोलॉजिस्ट कैंप के जरिए जब सैकड़ों महिलाओं को विशेषज्ञ डॉक्टरों से मुफ्त परामर्श मिला, तो यह प्रयास इतना बड़ा हो गया कि Golden Book of World Records ने इसे सबसे बड़े गाइनेकोलॉजिस्ट कैंप के रूप में दर्ज किया। लेकिन आर्ना फाउंडेशन के लिए असली रिकॉर्ड वो नहीं था, असली उपलब्धि थी उन 170 महिलाओं की मुस्कान, जिन्होंने सिलाई सीखकर अपने हाथों से अपनी पहचान गढ़नी शुरू की।

गौरतलब है कि, 15 अगस्त 2026 को , जब आजादी के जश्न के बीच अरपन दिव्यांग स्कूल के बच्चों के हाथों में स्टेशनरी की किताबें और कलम थमाई गईं। उस दिन तिरंगे की शान के साथ-साथ एक और संदेश गूँजा नशे से दूरी और जिंदगी से करीबी। बच्चों की आँखों में जो चमक थी, वह किसी भी स्वतंत्रता दिवस समारोह से कहीं ज्यादा मूल्यवान थी।

रक्तदान शिविरों में जब लोग बिना पहचाने भी एक अजनबी की जान बचाने के लिए अपनी बाँह आगे बढ़ाते, तब आर्ना फाउंडेशन यह साबित करता कि इंसानियत आज भी जिंदा है। गरीब परिवारों तक भोजन और कपड़े पहुँचाना, जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा और छात्रवृत्ति से जोड़ना, और पर्यावरण को बचाने के लिए हरियाली का संदेश देना यह सब उस एक विचार की शाखाएँ बनकर फैलती गईं, जो 2018 की उस सुबह जन्मा था।

आज आर्ना फाउंडेशन सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि एक भरोसे का नाम बन चुका है। यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है , यह हर उस दिन आगे बढ़ती है, जब कोई दिव्यांग बच्चा पहली बार खुद से कुछ लिखना सीखता है, जब कोई महिला अपनी सिलाई मशीन पर पहला कपड़ा तैयार करती है, या जब कोई बुजुर्ग सालों बाद फिर से दुनिया को साफ आँखों से देख पाता है। और शायद यही आर्ना फाउंडेशन की सबसे बड़ी पूँजी है, यह विश्वास कि एक छोटी सी शुरुआत, सही नीयत के साथ, समाज को बदलने की ताकत रखती है।

आइए, इस सामाजिक बदलाव की मुहिम में आर्ना फाउंडेशन के साथ चलिए।

सेवा, सहयोग और बदलाव के लिए संपर्क करें: ???? 8959110999 | 7974339388

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