- Post by Admin on Monday, Oct 12, 2026
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कमलेश यादव ; कहते हैं, जब ज़िंदगी सारे दरवाज़े बंद कर दे, तब इंसान के भीतर का हुनर चुपके से एक नई खिड़की खोल देता है। राजनांदगांव की श्रीमती कुसुम जितेंद्र साहू की कहानी ऐसी ही खिड़की से आई रोशनी की तरह है। जिस मोड़ पर बहुत से लोग आँसू पोंछकर हार मान लेते हैं, वहाँ से उन्होंने अपना सबसे लंबा सफ़र शुरू किया। आज उनके हाथों से बुना हुआ हर धागा सिर्फ़ कपड़ा नहीं जोड़ता, वह टूटे हुए हौसले भी जोड़ता है। "सुई धागा बुटीक एवं आर्ट गैलरी" के ज़रिए वह अपने बच्चों का भविष्य सँवार रही हैं और कई ज़रूरतमंद महिलाओं को यह यक़ीन दिला रही हैं कि वे भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। उनकी पूरी ज़िंदगी को अगर एक शब्द में कहें, तो वह है "संघर्ष और सेवा"।
कुसुम जी की ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा था। भरा-पूरा घर था, परिवार का साथ था और हर कदम पर निभाने वाला जीवनसाथी भी। फिर साल 2009 में अचानक सब बदल गया। पति जितेंद्र जी का असमय जाने के बाद उस पल ऐसा लगा मानो पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गई हो। आँखों के सामने अँधेरा छा गया और दोनों बच्चों की परवरिश की चिंता सामने खड़ी हो गई। कुसुम भीतर से टूट गईं, लेकिन यह टूटना उनकी कहानी का अंत नहीं, एक नई शुरुआत की पहली सीढ़ी बना।
बच्चों का पेट पालना था, इसलिए उन्होंने आजीविका के लिए एक प्राइवेट नौकरी की। लेकिन मन वहाँ नहीं लगा। वह काम उनके स्वभाव और स्वाभिमान से मेल नहीं खाता था। भीतर से एक आवाज़ बार-बार कहती थी कि उनकी असली पहचान कहीं और है। तब उन्होंने वही रास्ता चुना, जो हमेशा से उनके हाथों में बसा था: सिलाई और बुनाई। कहते हैं हुनर कभी बेकार नहीं जाता, और कुसुम जी ने इसे सच कर दिखाया। घर के एक कोने से उन्होंने अपना काम शुरू किया। न बड़ी दुकान थी, न बड़ी पूँजी, बस भरोसा था अपने हाथों पर।
धीरे-धीरे उनके हुनर की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। जो ग्राहक एक बार कपड़े सिलवाने पहुँचा, वह अगली बार अपने परिवार और पहचान वालों को भी साथ ले गया। मेहनत रंग ला रही थी और लोगों का भरोसा दिन-ब-दिन गहरा होता गया। इसी भरोसे के सहारे 17 सितंबर 2021 को उन्होंने "सुई धागा बुटीक एवं आर्ट गैलरी" की नींव रखी। जो सपना कभी घर की चारदीवारी में पल रहा था, वह अब राजनांदगांव में अपनी अलग पहचान के साथ खड़ा है। यह सिर्फ़ एक दुकान नहीं, बरसों की मेहनत और सब्र का फल है।
पर यह सफ़र फूलों की सेज नहीं था। अतीत की बात पूछने पर कुसुम जी की आँखों में एक ख़ामोशी उतर आती है। वह सहम-सी जाती हैं। ज़िंदगी में उन्हें मौक़ापरस्त लोग भी मिले, जिन्होंने मदद का दिखावा किया और भरोसा तोड़ा। धोखे की चोट गहरी थी, लेकिन उन्होंने कड़वाहट को अपने काम पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने शिकायतों में वक़्त गँवाने की जगह सुई-धागे में अपना भविष्य बुनना ज़्यादा ज़रूरी समझा।
आज कुसुम जी अपने काम से संतुष्ट हैं और इसके लिए वह ईश्वर का धन्यवाद करना नहीं भूलतीं। उनके दो बच्चे उनकी ज़िंदगी की रोशनी हैं। वह उन्हें अपनी आँखें कहती हैं, और उनकी बस एक ही चाह है कि दोनों खूब तरक्की करें और जीवन में आगे बढ़ें। इसी उम्मीद के सहारे उन्होंने हर मुश्किल दिन काटा है। एक माँ की दुआ और मेहनत ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है।
कुसुम जी की सोच सिर्फ़ अपने परिवार तक सीमित नहीं है। उन्हें याद है कि अँधेरे के दिनों में सहारे की कितनी कमी खलती थी। इसीलिए अपने बुटीक के ज़रिए वह उन ज़रूरतमंद महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण बन रही हैं, जो आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं। वह उन्हें हुनर सिखाती हैं, हौसला देती हैं और यक़ीन दिलाती हैं कि वे भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। आने वाले समय में वह और ज़्यादा महिलाओं को इस सफ़र से जोड़ना चाहती हैं।
कुसुम जी अक्सर कहती हैं कि समय और हालात कैसे भी हों, अन्याय के आगे कभी झुकना नहीं चाहिए। यह वाक्य उनके पूरे जीवन का निचोड़ है। जिस महिला ने कभी सब कुछ खोया था, आज वही दूसरों को जीना सिखा रही है। राजनांदगांव की यह साधारण-सी दिखने वाली महिला असल में एक असाधारण प्रेरणा है। उनकी कहानी हर उस महिला के लिए संदेश है जो मुश्किलों से घिरी है कि हाथ में हुनर और दिल में हिम्मत हो, तो अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, सुबह ज़रूर होती है।
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