कमलेश यादव : बालोद जिले के मुख्यालय से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर बसा है एक छोटा सा गाँव कांदुल। धान के लहलहाते खेतों से घिरा यह गाँव देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन यहाँ की मिट्टी में कुछ खास बात है। सुबह की पहली किरण के साथ जब गाँव के लोग अपने खेतों की ओर निकलते हैं, तो एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराना, हाल-चाल पूछना और ज़रूरत पड़ने पर बिना कहे मदद के लिए हाथ बढ़ा देना यही कांदुल की असली पहचान है। यहाँ रिश्ते सिर्फ ब्लड के नहीं, बल्कि आपसी भरोसे और सेवा भावना के धागों से बुने हुए हैं। यही वजह है कि जब भी किसी परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूटता है, पूरा गाँव एक परिवार की तरह उसके साथ खड़ा हो जाता है।

इसी एकजुटता को एक संगठित रूप देने का काम किया है गाँव के युवाओं ने, जिन्होंने मिलकर "सांझ सवेरा समूह" का गठन किया। इस समूह के माध्यम से गाँव में रहने वाले जरूरतमंदों की मदद की जाती है चाहे वह किसी गरीब परिवार के बच्चे की पढ़ाई का खर्च हो, किसी बीमार व्यक्ति के इलाज में सहयोग हो, या फिर किसी असहाय बुजुर्ग के लिए राशन की व्यवस्था। समूह की सबसे संवेदनशील पहल तब सामने आती है जब गाँव में किसी की निधन हो जाती है। ऐसे कठिन समय में, जब परिवार शोक में डूबा होता है, समूह के सदस्य आगे आकर अंतिम संस्कार से लेकर आर्थिक सहायता तक की पूरी व्यवस्था संभालते हैं, ताकि दुख की इस घड़ी में परिवार को आर्थिक तंगी का बोझ न उठाना पड़े।

संस्था के अध्यक्ष गुणवंत साहू इस पहल के पीछे की सोच साझा करते हुए कहते हैं कि गाँव में हर व्यक्ति एक-दूसरे का सहारा है, और यही भावना उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उनका मानना है कि असली सेवा वही है जो बिना किसी स्वार्थ के, अपने ही आस-पड़ोस के लोगों के लिए की जाए। उनके अनुसार, "सांझ सवेरा समूह" का उद्देश्य सिर्फ आर्थिक मदद देना नहीं, बल्कि गाँव में भाईचारे और सामूहिकता की उस भावना को जीवित रखना है, जो आज के दौर में धीरे-धीरे कम होती जा रही है। गाँव के बुजुर्गों का कहना है कि ऐसे युवा संगठन न सिर्फ जरूरतमंदों को राहत पहुँचाते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सेवा और सहयोग की सीख देते हैं। कांदुल का यह प्रयास आज आसपास के गाँवों के लिए भी एक प्रेरणा बनकर उभरा है।

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