- Post by Admin on Thursday, Jul 30, 2026
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कमलेश यादव : बालोद जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर, धान के लहलहाते खेतों और कच्ची पगडंडियों के बीच बसा है एक छोटा-सा गांव माहुद, जिसकी आबादी लगभग 2000 है। यहां की सबसे खास बात यह है कि गांव की कोई भी समस्या हो, लोग उसे अकेले नहीं बल्कि मिल-जुलकर सुलझाते हैं,मानो पूरा गांव एक परिवार हो। न आधुनिक सुविधाएं, फिर भी इस मिट्टी ने कुछ ऐसा रच दिया, जिसकी गूंज पूरे जिले में सुनाई देती है।
कहते हैं कि हर गांव की अपनी एक पहचान होती है, कोई नदी से जाना जाता है तो कोई मेले से लेकिन माहुद की पहचान बन गया एक इंसान, जिसने अपनी सेवा को कभी रुतबे का प्रतीक नहीं, बल्कि सेवा का पर्याय माना। यह कहानी है डॉक्टर वासुदेव साहू की, जिन्होंने साबित किया कि इंसानियत की सबसे बड़ी डिग्री किसी किताब में नहीं, बल्कि दिल में लिखी होती है।
गौरतलब है कि, चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करके डॉ. साहू ने दो दशक पहले माहुद में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी। उन्होंने चिकित्सा को केवल पेशा नहीं बल्कि सेवा धर्म के रूप में अपनाया। उनके लिए इलाज का मतलब केवल दवाई देना नहीं, बल्कि मरीज के दुख में साझीदार बनना रहा है। यह सेवा भावना उनके परिवार में भी झलकती है, उनके दोनों बच्चे आज MBBS की डिग्री लेकर चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
डॉ. वासुदेव साहू कहते है कि, गांव ने मुझे जितना दिया है, मैं जिंदगी भर भी उसका कर्ज नहीं चुका सकता इसलिए यह मेरा फर्ज है कि जब तक शरीर साथ दे, तब तक सेवा करता रहूं। और यह सिर्फ मेरी बात नहीं है, अंधविश्वास के अंधेरे को मिटाना और हर बच्चे को एक सुरक्षित बचपन देना यही असली विकास है। मुझे उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ी इसे सिर्फ एक कहानी की तरह नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह आगे बढ़ाएगी।"
25 साल के इस सफर में न जाने कितने चेहरे बदले, कितनी पीढ़ियां गुजरीं, लेकिन डॉ. साहू का दरवाजा और उनका धैर्य वैसा ही बना रहा। गांव वाले कहते हैं कि आधी रात को भी अगर किसी मरीज की तबीयत बिगड़े, तो डॉक्टर साहब सहायता के लिए ततपर रहते हैं मानो सेवा के लिए घड़ी और थकान के मायने ही उनके लिए खत्म हो गए हों।
डॉ. साहू की सेवा भावना केवल दवाई और इलाज तक सीमित नहीं रही। जब भी किसी कुपोषित बच्चे की खबर उन तक पहुंची, वे बिना देर किए उसकी जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो जाते। ऐसे कई बच्चों को उन्होंने गोद लिया और उन्हें एक नई जिंदगी दी। गांव के लोग बताते हैं कि जरूरतमंदों की मदद के लिए उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता था।
सामाजिक सरोकार की इस यात्रा में एक और अनोखा अध्याय जुड़ा, जब डॉ. साहू ने उन जोड़ों का हाथ थामा जिनके पास शादी के लिए संसाधन नहीं थे। अब तक वे 15 जोड़ों का विवाह करवा चुके हैं, हर विवाह के पीछे किसी गरीब परिवार की बेटी या असहाय जोड़े की कहानी छिपी है। लेकिन डॉ. साहू की सबसे बड़ी लड़ाई अंधविश्वास के खिलाफ रही। उन्होंने महसूस किया कि गांवों में बीमारी से ज्यादा खतरनाक कभी-कभी अंधविश्वास होता है, जो लोगों को सही इलाज से दूर रखता है। इसी सोच के साथ उन्होंने करीब 15 गांवों में अंधश्रद्धा उन्मूलन के लिए जागरूकता अभियान चलाया।
उनके इस प्रयास की गूंज इतनी दूर तक पहुंची कि वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने स्वयं उन्हें सम्मानित किया। आज डॉ. वासुदेव साहू की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की गाथा है, जिसने साबित किया कि सच्ची सेवा किसी बड़े शहर या बड़े अस्पताल की मोहताज नहीं होती। माहुद जैसे छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने जो मिसाल कायम की, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
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